Inter Board Exam 2024 Vvi Questions इंटरमीडिएट परीक्षा 2024 महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर हिंदी ।।

Inter Board Exam 2024

1. (क) देखें वर्ष 2010 प्रश्न संख्या-2 (अथवा) का उत्तर

2. (क) अथवा, स्वयं करें

2. (ख) व्याख्या – प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ छायावाद के प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता से उद्धृत

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प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि जहाँ मरुभूमि की ज्वाला धधकती है और चातकी जल के कण को तरसती है उन्हीं जीवन की घाटियों में मैं (आशा) सरस बरसात बन जाती है। कवि का भाव है कि जिन लोगों का जीवन मरुस्थल की सूखी घाटी के समान (सम्पर्क) से उल्लसित हो उठा है। व्यथा का घोर अंधकार समाप्त हो गया है। कवि जीवन की अनेक बाधाओं एवं विसंगतियों का भुक्तभोगी एवं साक्षी है। कवि अपने कथन की सम्पुष्टि के लिए अनेक प्रतीकों एवं प्रकृति का सहारा लेता है यथा-मरु-ज्वाला, चातकी, घाटियाँ, पवन को प्राचीर, झुलसावै विश्व दिन, कुसुम ऋतु-रत, नीरधर, अश्रु-सर, मधु, मरन्द – मुकलित आदि।

इस प्रकार कवि ने जीवन के दोनों पक्षों का सूक्ष्म विवेचन किया है। वह अशान्ति, असफलता, अनुपयुक्तता तथा अराजकता से विचलित नहीं है।

2. (ख) अथवा, व्याख्या- प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-2 के रघुवीर सहाय विरचित ” अधिनायक” शीर्षक कविता से उद्धृत है। इन पंक्तियों में कवि ने उन जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष किया है जो इतने दिनों की आजादी के बाद भी आम आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं ला पाये हैं।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि जानना चाहता है कि वह कौन भाग्य विधाता है जिसका गान हरचरना नाम का एक गरीब विद्यार्थी कर रहा है। वह गरीब विद्यार्थी है। अपनी लाचारी का प्रमाण लिए हुए वह राष्ट्रीय गीत गाता है। कवि का यह कटु व्यंग्य बड़ा ही उचित एवं सामयिक है। सचमुच, आज लाखों गरीब छात्र अपने विद्यालयों में बिना मन के राष्ट्रीय गीत का गान करते हैं। उन्हें नहीं पता कि वे किसका गान कर रहे हैं।

इस प्रकार प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने आज के सत्ताधारी नेताओं पर कटाक्ष किया है। ये सत्ताधारी नेता आज तानाशाह बने हुए हैं। 3. आदरणीय पिता जी सादर चरण स्पर्श मुसल्लहपुर कोइरी टोला पटना

10 मार्च 2018

मैं यहाँ सकुशल हूँ। आशा करता हूँ कि आप लोग भी सकुशल होंगे। मैं पिछले सप्ताह राजगीर (बिहार) गया था। यह बड़ा ही दर्शनीय स्थल है। यहाँ गर्म कुंड से सल्फर युक्त पानी गिरता है। जाड़े में स्नान करने में बड़ा ही मजा आता है। रज्जू मार्ग से कुर्सियों पर बैठकर असमान में जाने में बड़ा आनंद आता है। पहाड़ के ऊपर बुद्ध भगवान की स्वर्णिम मूर्तियों हैं। पूजा-पाठ भी चलता रहता है। बुद्ध ने जीवन में मध्यम मार्ग से चलने की प्रेरणा दी थी। आपके और माता जी के साथ आनंद में और भी वृद्धि हो जाती। राजगीर में सरकारी पर्यटन ठहराव भवन में भोजन का बड़ा बढ़िया इंतजाम था । यात्रा रोमांचक रही।

2. (i) दहेज प्रथा-आज दहेज की प्रथा को देश भर में बुरा माना जाता है। इसके कारण कई दुर्घटनाएँ हो जाती हैं, कितने घर बर्बाद हो जाते हैं। आत्महत्याएँ भी होती देखी गई हैं। नित्य-प्रति तेल डालकर बहुओं द्वारा अपने आपको आग लगाने की घटनाएँ भी समाचार-पत्रों में पढ़ी जाती हैं। पति एवं सास-ससुर भी बहुओं को जला देते या हत्याएँ कर देते हैं। इसलिए दहेज प्रथा को आज कुरीति माना जाने लगा है। भारतीय सामाजिक जीवन में अनेक अच्छे गुण हैं, परंतु कतिपय बुरी रीतियाँ भी उसमें घुन की भाँति लगी हुई हैं। इनमें एक रीति दहेज प्रथा की भी है। विवाह के साथ ही पुत्री को दिए जाने वाले सामान को दहेज कहते हैं। इस दहेज में बर्तन, वस्त्र, पलंग, सोफा, रेडियो, मशीन, टेलीविजन आदि की बात ही क्या है, हजारों रुपया नकद भी दिया जाता है। इस दहेज को पुत्री के स्वस्थ शरीर, सौन्दर्य और सुशीलता के साथ ही जीवन को सुविधा देने वाला माना जाता है। दहेज प्रथा का इतिहास देखा जाए’ तब इसका प्रारम्भ किसी बुरे उद्देश्य से नहीं हुआ था। दहेज प्रथा का उल्लेख मनु स्मृति में ही प्राप्त हो जाता है, जबकि वस्त्राभूषण युक्त कन्या के विवाह की चर्चा की गई है। गौएँ तथा अन्य वाहन आदि देने का उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है। समाज में जीवनोपयोगी सामग्री देने का वर्णन भी मनुस्मृति में किया गया है, परंतु कन्या को दहेज देने के दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि माता पिता अपनी कन्या को दान देते समय यह सोचते थे कि वस्त्रादि सहित कन्या को कुछ सामान दे देने उसका जीवन सुविधापूर्वक चलता रहेगा और कन्या को प्रारम्भिक जीवन में कोई कष्ट न होगा। दूसरा कारण यह था कि कन्या भी घर में अपने भाईयों के समान भागीदार है, चाहे वह अचल सम्पत्ति नहीं लेती थी, परंतु विवाह के काल में उसे यथाशक्ति धन, पदार्थ आदि दिया जाता था, ताकि वह सुविधा से जीवन व्यतीत करके और इसके पश्चात भी उसे जीवन भर सामान मिलता रहता था। घर भर में उसका सम्मान हमेशा बना रहता था। पुत्री जब भी पिता के घर आती थी, उसे अवश्य ही धन-वस्त्रादि दिया जाता था। इस प्रथा के दुष्परिणामों से भारत के मध्ययुगीन इतिहास में अनेक घटनाएँ भरी पड़ी हैं। धनी और निर्धन व्यक्तियों को दहेज देने और न देने की स्थिति में दोनों में कष्ट सहने पड़ते रहे । धनियों से दहेज न दे सकने से दुःख भोगना पड़ता रहा है। समय के चक्र में इस सामाजिक उपयोगिता की प्रथा ने धीरे-धीरे अपना बुरा रूप धारण करना आरम्भ कर दिया और लोगों ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के लिए भरपूर धन देने की प्रथा चला दी। इस प्रथा को खराब करने का आरम्भ धनी वर्ग से ही हुआ है क्योंकि धनियों को धन की चिंता नहीं होती। वे अपनी लड़कियों के लिए लड़का खरीदने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दहेज-प्रथा ने जघन्य बुरा रूप धारण कर लिया और समाज में यह कुरीति-सी बन गई है। अब इसका निवारण दुष्कर हो रहा है। नौकरी-पेशा या निर्धनों को इस प्रथा से अधिक कष्ट पहुँचता है। अब तो बहुधा लड़के को बैंक का एक चैक मान लिया जाता है कि जब लड़की वाले आयें तो उनकी खाल खींचकर पैसा इकट्ठा कर लिया जाये ताकि लड़की का विवाह कर देने के साथ ही उसका पिता बेचारा कर्ज से भी दब जाये।

दहेज प्रथा को सर्वथा बंद नहीं किया जाना चाहिए परंतु कानून बनाकर एक निश्चित मात्रा तक दहेज देना चाहिए। अब तो पुत्री और पुत्र का पिता की सम्पत्ति में समान भाग स्वीकार किया गया है। इसलिए भी दहेज को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए और लड़कों को माता-पिता द्वारा मनमानी धन दहेज लेने पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए। जो लोग दहेज में मनमानी करें उन्हें दण्ड देकर इस दिशा में सुधार करना चाहिए। दहेज प्रथा को भारतीय समाज के माथे पर कलंक के रूप में नहीं रहने देना चाहिए।

(ii) नशामुक्ति-देखें वर्ष 2013, प्रश्न संख्या-2

(घ) का उत्तर (iii) प्रिय कवि देखें वर्ष 2014, प्रश्न संख्या-4

(ग) का उत्तर (iv) पर्यावरण- देखें वर्ष 2011 प्रश्न संख्या-3

(क) का उत्तर (v) छात्र अनुशासन- देखें वर्ष 2017 प्रश्न संख्या-1(v) का उत्तर

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